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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
न ग्राम्यधर्मेषु रतिस्तवास्ति; कामान्न किञ्चित्कुरुषे नरेन्द्र |  १८   क
न चार्थलोभात्प्रजहासि धर्मं; तस्मात्स्वभावादसि धर्मराजः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति