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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
दानं च सत्यं च तपश्च राज; ञ्श्रद्धा च शान्तिश्च धृतिः क्षमा च |  १९   क
अवाप्य राष्ट्राणि वसूनि भोगा; नेषा परा पार्थ सदा रतिस्ते ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति