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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
असंशय़ं सर्वसमृद्धकामः; क्षिप्रं प्रजाः पालय़ितासि सम्यक् |  २१   क
इमे वय़ं निग्रहणे कुरूणां; यदि प्रतिज्ञा भवतः समाप्ता ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति