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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
आनर्तमेवाभिमुखाः शिवेन; गत्वा धनुर्वेदरतिप्रधानाः |  २५   क
तवात्मजा वृष्णिपुरं प्रविश्य; न दैवतेभ्यः स्पृहय़न्ति कृष्णे ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति