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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
आवर्ततां कार्मुकवेगवाता; हलाय़ुधप्रग्रहणा मधूनाम् |  ३२   क
सेना तवार्थेषु नरेन्द्र यत्ता; ससादिपत्त्यश्वरथा सनागा ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति