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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
कामं तथा तिष्ठ नरेन्द्र तस्मि; न्यथा कृतस्ते समय़ः सभाय़ाम् |  ३४   क
दाशार्हय़ोधैस्तु ससादिय़ोधं; प्रतीक्षतां नागपुरं भवन्तम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति