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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
व्यपेतमन्युर्व्यपनीतपाप्मा; विहृत्य यत्रेच्छसि तत्र कामम् |  ३५   क
ततः समृद्धं प्रथमं विशोकः; प्रपत्स्यसे नागपुरं सराष्ट्रम् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति