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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्विनिहते नूनं युध्यतेऽसौ जनार्दनः |  ३३   क
यस्य सत्त्ववतो वीर्यमुपजीवन्ति पाण्डवाः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति