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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
असंशय़ं केशव पाण्डवानां; भवान्गतिस्त्वच्छरणा हि पार्थाः |  ३७   क
कालोदय़े तच्च ततश्च भूय़ः; कर्ता भवान्कर्म न संशय़ोऽस्ति ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति