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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
विदिता हि हरेर्यूय़मिहाय़ाताः कुरूद्वहाः |  ४   क
सदा हि दर्शनाकाङ्क्षी श्रेय़ोऽन्वेषी च वो हरिः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति