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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
तमर्चितं सुविष्वस्तमासीनमृषिसत्तमम् |  ४१   क
व्राह्मणानां मतेनाह पाण्डवानां च केशवः ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति