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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
तेषु तत्रोपविष्टेषु देवर्षिरपि नारदः |  ४४   क
आजगाम विशुद्धात्मा पाण्डवानवलोककः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति