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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
तमप्यथ महात्मानं सर्वे तु पुरुषर्षभाः |  ४५   क
पाद्यार्घ्याभ्यां यथान्याय़मुपतस्थुर्मनीषिणम् ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति