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सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
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कृप उवाच
किं नाम दुःखं लोकेऽस्मिन्पितुर्वधमनुस्मरन् |  २३   क
हृदय़ं निर्दहन्मेऽद्य रात्र्यहानि न शाम्यति ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति