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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
वहुवत्सरजीवी च मार्कण्डेय़ो महातपाः |  ५   क
स्वाध्याय़तपसा युक्तः क्षिप्रं युष्मान्समेष्यति ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति