आदि पर्व  अध्याय ३२

शेष उवाच

यथाह देवो वरदः प्रजापति; र्महीपतिर्भूतपतिर्जगत्पतिः |  २०   क
तथा महीं धारय़ितास्मि निश्चलां; प्रय़च्छ तां मे शिरसि प्रजापते ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति