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द्रोण पर्व
अध्याय १२०
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सञ्जय़ उवाच
अनर्जुनाय़ां च भुवि मुहूर्तमपि मानद |  १४   क
जीवितुं नोत्सहेरन्वै भ्रातरोऽस्य सहानुगाः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति