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द्रोण पर्व
अध्याय ५२
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सञ्जय़ उवाच
उपसङ्ग्रहणं कृत्वा द्रोणाय़ स विशां पते |  २१   क
उपोपविश्य प्रणतः पर्यपृच्छदिदं तदा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति