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आदि पर्व
अध्याय १८१
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वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मे पौरन्दरे चास्त्रे निष्ठितो गुरुशासनात् |  २०   क
स्थितोऽस्म्यद्य रणे जेतुं त्वां वीराविचलो भव ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति