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अनुशासन पर्व
अध्याय १५०
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भीष्म उवाच
तत्र कश्चिन्नय़ेत्प्राज्ञो गृहीत्वैव करे नरम् |  ९   क
उह्यमानः स धर्मेण धर्मे वहुभय़च्छले ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति