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शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
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वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा भारतमाख्यानं तपःश्रान्तस्य धीमतः |  १०   क
शुश्रूषां तत्परा राजन्कृतवन्तो वय़ं तदा ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति