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शान्ति पर्व
अध्याय १८१
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भृगुरु उवाच
गोषु वृत्तिं समाधाय़ पीताः कृष्युपजीविनः |  १२   क
स्वधर्मं नानुतिष्ठन्ति ते द्विजा वैश्यतां गताः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति