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द्रोण पर्व
अध्याय १४४
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सञ्जय़ उवाच
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा माद्रीपुत्रस्य धीमतः |  १४   क
प्राय़ात्तेन रणे राजन्येन द्रोणोऽन्वय़ुध्यत ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति