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वन पर्व
अध्याय १८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
निर्मलानि शरीराणि विशुद्धानि शरीरिणाम् |  ११   क
ससर्ज धर्मतन्त्राणि पूर्वोत्पन्नः प्रजापतिः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति