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वन पर्व
अध्याय १८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वे देवैः समाय़ान्ति स्वच्छन्देन नभस्तलम् |  १३   क
ततश्च पुनराय़ान्ति सर्वे स्वच्छन्दचारिणः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति