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वन पर्व
अध्याय १८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
द्रष्टारो देवसङ्घानामृषीणां च महात्मनाम् |  १५   क
प्रत्यक्षाः सर्वधर्माणां दान्ता विगतमत्सराः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति