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वन पर्व
अध्याय १८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
अशुभैः कर्मभिः पापास्तिर्यङ्नरकगामिनः |  १८   क
संसारेषु विचित्रेषु पच्यमानाः पुनः पुनः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति