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वन पर्व
अध्याय १८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
जन्तोः प्रेतस्य कौन्तेय़ गतिः स्वैरिह कर्मभिः |  २१   क
प्राज्ञस्य हीनवुद्धेश्च कर्मकोशः क्व तिष्ठति ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति