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वन पर्व
अध्याय १८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
क्वस्थस्तत्समुपाश्नाति सुकृतं यदि वेतरत् |  २२   क
इति ते दर्शनं यच्च तत्राप्यनुनय़ं शृणु ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति