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वन पर्व
अध्याय १८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
अय़मादिशरीरेण देवसृष्टेन मानवः |  २३   क
शुभानामशुभानां च कुरुते सञ्चय़ं महत् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति