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वन पर्व
अध्याय १८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
आय़ुषोऽन्ते प्रहाय़ेदं क्षीणप्राय़ं कलेवरम् |  २४   क
सम्भवत्येव युगपद्योनौ नास्त्यन्तराभवः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति