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वन पर्व
अध्याय १८१
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वैशम्पाय़न उवाच
सेव्यश्चोपासितव्यश्च मतो नः काङ्क्षितश्चिरम् |  ३   क
अय़ं च देवकीपुत्रः प्राप्तोऽस्मानवलोककः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति