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वन पर्व
अध्याय १८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
च्यवन्तं जाय़मानं च गर्भस्थं चैव सर्वशः |  ३१   क
स्वमात्मानं परं चैव वुध्यन्ते ज्ञानचक्षुषः |  ३१   ख
कर्मभूमिमिमां प्राप्य पुनर्यान्ति सुरालय़म् ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति