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वन पर्व
अध्याय १८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
किञ्चिद्दैवाद्धठात्किञ्चित्किञ्चिदेव स्वकर्मभिः |  ३२   क
प्राप्नुवन्ति नरा राजन्मा तेऽस्त्वन्या विचारणा ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति