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वन पर्व
अध्याय १८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
धनानि येषां विपुलानि सन्ति; नित्यं रमन्ते सुविभूषिताङ्गाः |  ३५   क
तेषामय़ं शत्रुवरघ्न लोको; नासौ सदा देहसुखे रतानाम् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति