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वन पर्व
अध्याय १८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
ये योगय़ुक्तास्तपसि प्रसक्ताः; स्वाध्याय़शीला जरय़न्ति देहान् |  ३६   क
जितेन्द्रिय़ा भूतहिते निविष्टा; स्तेषामसौ नाय़मरिघ्न लोकः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति