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उद्योग पर्व
अध्याय ३७
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विदुर उवाच
स्त्रीषु राजसु सर्पेषु स्वाध्याय़े शत्रुसेविषु |  ५३   क
भोगे चाय़ुषि विश्वासं कः प्राज्ञः कर्तुमर्हति ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति