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वन पर्व
अध्याय १८१
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वैशम्पाय़न उवाच
भवत्येव हि मे वुद्धिर्दृष्ट्वात्मानं सुखाच्च्युतम् |  ४   क
धार्तराष्ट्रांश्च दुर्वृत्तानृध्यतः प्रेक्ष्य सर्वशः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति