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वन पर्व
अध्याय १८१
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मार्कण्डेय़ उवाच
स्वर्गं परं पुण्यकृतां निवासं; क्रमेण सम्प्राप्स्यथ कर्मभिः स्वैः |  ४१   क
मा भूद्विशङ्का तव कौरवेन्द्र; दृष्ट्वात्मनः क्लेशमिमं सुखार्ह ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति