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वन पर्व
अध्याय १८१
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वैशम्पाय़न उवाच
कर्मणः पुरुषः कर्ता शुभस्याप्यशुभस्य च |  ५   क
स्वफलं तदुपाश्नाति कथं कर्ता स्विदीश्वरः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति