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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
कीदृशं च भवेद्राज्यं मम हीनस्य वन्धुभिः |  ४४   क
सखिभिश्च सुहृद्भिश्च प्रणिपत्य च पाण्डवम् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति