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आदि पर्व
अध्याय १८२
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वैशम्पाय़न उवाच
गत्वा तु तां भार्गवकर्मशालां; पार्थौ पृथां प्राप्य महानुभावौ |  १   क
तां याज्ञसेनीं परमप्रतीतौ; भिक्षेत्यथावेदय़तां नराग्र्यौ ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति