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आदि पर्व
अध्याय १८२
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वैशम्पाय़न उवाच
काम्यं रूपं हि पाञ्चाल्या विधात्रा विहितं स्वय़म् |  १३   क
वभूवाधिकमन्याभ्यः सर्वभूतमनोहरम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति