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आदि पर्व
अध्याय १८२
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वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं हि कन्या द्रुपदस्य राज्ञ; स्तवानुजाभ्यां मय़ि संनिसृष्टा |  ४   क
यथोचितं पुत्र मय़ापि चोक्तं; समेत्य भुङ्क्तेति नृप प्रमादात् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति