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आदि पर्व
अध्याय १८२
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वैशम्पाय़न उवाच
कथं मय़ा नानृतमुक्तमद्य; भवेत्कुरूणामृषभ व्रवीहि |  ५   क
पाञ्चालराजस्य सुतामधर्मो; न चोपवर्तेत नभूतपूर्वः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति