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शान्ति पर्व
अध्याय १८२
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भृगुरु उवाच
नित्यं क्रोधात्तपो रक्षेच्छ्रिय़ं रक्षेत मत्सरात् |  १०   क
विद्यां मानावमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति