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शान्ति पर्व
अध्याय १८२
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भृगुरु उवाच
अहिंस्रः सर्वभूतानां मैत्राय़णगतश्चरेत् |  १२   क
अविस्रम्भे न गन्तव्यं विस्रम्भे धारय़ेन्मनः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति