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शान्ति पर्व
अध्याय १८२
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भृगुरु उवाच
परिग्रहान्परित्यज्य भवेद्वुद्ध्या जितेन्द्रिय़ः |  १३   क
अशोकं स्थानमातिष्ठेदिह चामुत्र चाभय़म् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति