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शान्ति पर्व
अध्याय १८२
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भृगुरु उवाच
इन्द्रिय़ैर्गृह्यते यद्यत्तत्तद्व्यक्तमिति स्थितिः |  १५   क
अव्यक्तमिति विज्ञेय़ं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रिय़म् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति