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शान्ति पर्व
अध्याय १८२
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भृगुरु उवाच
शौचेन सततं युक्तस्तथाचारसमन्वितः |  १७   क
सानुक्रोशश्च भूतेषु तद्द्विजातिषु लक्षणम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति